पंडा सभा

प्रस्तुत है पंडा सभा से जुड़ी सभी छोटी-बड़ी जानकारी

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श्री बृजवासी पंडा सभा(रजि0), वृंदावन

श्री बृजवासी पंडा सभा एक अति प्राचीन संगठन है जिसका गठन सन 1915 में हुआ था। तथा रजिस्ट्रेशन सन 1930 में हुआ लगभग 10 वर्ष पूर्व 2015 में श्री बृजवासी पंडा सभा द्वारा अपने स्थापना दिवस के अवसर पर एक अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें भारतवर्ष के लगभग 100 से अधिक तीर्थ के तीर्थ पुरोहितों ने सहभागिता की।

बृजवासी पंडा सभा की स्थापना के बाद लगभग सन 1940 से पहले महामना मदन मोहन मालवीय वृंदावन धाम आए उन्होंने जब यहां तीर्थ पुरोहितों के संगठन को देखा तो उनको बहुत आश्चर्य हुआ कि वृंदावन जैसे छोटे से कस्बे में तीर्थ पुरोहित इतने जागरूक हैं जो संगठन बनाकर रहते हैं इससे प्रभावित होकर महामना मदन मोहन मालवीय ने सन 1940 में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा (ऑल इंडिया ब्राह्मण काउंसिल) का गठन किया।

श्री बृजवासी पंडा सभा सन 1915 से लेकर अब तक बृज के प्राचीनतम संगठन के रूप में तीर्थ पुरोहितों तथा वृंदावन धाम के हितार्थ कार्य कर रहा है। समय-समय पर इस संगठन में अनेक महापुरुष जनों ने अपना योगदान दिया है। ऐसे ही महापुरुषों में एक नाम मदन मोहन बांके जी का है, जो वृंदावन में बड़े ही प्रभावशाली व्यक्ति थे। जिनका अंग्रेजों के शासन में भी बोल-बाला था। जिनकी कद काठी 7 फुट से भी अधिक थी और मल्लविद्या में अत्यंत ही निपुण थे। उनके द्वारा वृंदावन में पंचायती गौशाला की स्थापना कराई गई और श्री बृजवासी पंडा सभा द्वारा आयोजित होने वाली बृज 84 कोस परिक्रमा को आरंभ करने में इनका विशेष योगदान था। इससे पूर्व यह परिक्रमा गौड़िया वैष्णव संत वल्लभ कुल संप्रदाय के गोस्वामियों तथा बृज विदेही महंत काठिया द्वारा कराई जाती थी। जिसमें तीर्थ पुरोहितों को विशेष सम्मान दिया जाता था, किंतु बाद में तीर्थ पुरोहितों की उपेक्षा होने पर उन्होंने इस यात्रा का बहिष्कार कर सन 1940 में नवीन यात्रा का आरंभ किया। जिसका मथुरा के चतुर्वेदी समाज द्वारा विरोध किया गया था, किंतु मदन मोहन बांके के प्रभाव एवं प्रतिष्ठा के आगे यह विरोध थम गया। श्री मदन मोहन बांके जी ने अपने जीते जी वृंदावन में किसी मस्जिद का निर्माण भी नहीं होने दिया। तदोपरांत श्रीमान रतनलाल पुरोहित जी ने भी पंडा सभा के अध्यक्ष पद पर रहते हुए तीर्थ पुरोहितों के हितार्थ कार्य किया। आप अत्यंत ब्राह्मणवादी व्यक्ति थे, जो ब्राह्मणों के स्वाभिमान को सर्वोपरि मानते थे। एक बार रंगनाथ मंदिर में ब्राह्मण भोज का आयोजन हुआ था, जिसमें ब्राह्मणों से पहले संतो को भोजन के लिए बैठाया गया था। इस बात से श्रीमान रतनलाल पुरोहित जी अत्यंत नाराज हो गए और उसी समय ब्राह्मणों से उस भोज का बहिष्कार करने के लिए कहा। सभी ब्राह्मणों ने उनकी बात मानते हुए उस भोज का बहिष्कार कर दिया। तब मंदिर प्रबंधन द्वारा माफी मांगने पर सभी ब्राह्मण भोजन करने के लिए सहमत हुए।

तदोपरांत श्रीमान छोटेलाल जी गौतम इस संगठन के अध्यक्ष पद पर सुशोभित रहे, जो झुन झुन लाठी साढ़े तीन भाई के नाम से विख्यात थे। आप अत्यंत ही सरस हृदय एवं स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी थे तथा समस्त तीर्थ पुरोहितों के लिए सम्मानित थे। उसके बाद श्रीमान श्यामलाल शर्मा (सांवरे जी), श्री बृजवासी पंडा सभा के अध्यक्ष पद पर सुशोभित रहे। आप बनखंडी क्षेत्र के निवासी थे तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी और दबंग व्यक्ति थे, जिनकी एक आवाज पर संपूर्ण समाज एकत्रित हो जाया करता था। आप सभी तीर्थ पुरोहितों का अत्यंत सम्मान किया करते थे। बृज के अन्य तीर्थों के तीर्थ पुरोहित भी आपके यहां छाना-घोटी करने के लिए वृंदावन आया करते थे। आपका प्रभाव संपूर्ण बृज के तीर्थ पुरोहितों पर था। आपने समस्त तीर्थ पुरोहितों को एक धागे में पिरोने का कार्य किया।

इसके उपरांत श्रीमान गजाधर सरदार जी इस संस्था के अध्यक्ष पद पर सुशोभित रहे। उस समय वृंदावन में ब्राह्मण समाज के अंदर विघटन का माहौल था। यह समाज गौतमबाद तथा सन्नाड्यबाद में बटा हुआ था तथा दोनों ही वर्गों में वर्चस्व की लड़ाई थी। आपने अपनी सूझबूझ के चलते प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर समाज हित का ताना-बाना बुनते हुए इस संस्था को आगे बढ़ाने का कार्य किया।

कालांतर में हर स्वरूप पाठक जी, इस संस्था के अध्यक्ष रहे, जो वृंदावन की एक प्रभावशाली व्यक्ति थे तथा वृंदावन नगर पालिका के अध्यक्ष पद पर भी सुशोभित हुए। उसे समय मथुरा का चतुर्वेदी समाज, बृज के अन्य तीर्थ पुरोहितों को स्वीकार नहीं करता था और स्वयं को ही संपूर्ण बृज का तीर्थ पुरोहित मानता था। आपने संपूर्ण बृज के तीर्थ पुरोहितों को एकत्रित करने के लिए वृंदावन की मिर्जापुर वाली धर्मशाला में तीर्थ पुरोहित सम्मेलन का आयोजन किया। जिसमें बृज के समस्त तीर्थ पुरोहितों ने बढ़-चढ़कर सहभागिता की तथा मथुरा के चतुर्वेदी समाज का बहिष्कार किया। इस पर चतुर्वेदी समाज ने गलती स्वीकार करते हुए, ब्रज के अन्य तीर्थ पुरोहितों को भी तीर्थ पुरोहित के रूप में स्वीकार किया।

हर स्वरूप पाठक जी के उपरांत प्रेमलाल गौतम जी, इस संगठन के अध्यक्ष पद पर क्रमशः सुशोभित रहे। आप उत्कृष्ट व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे, जिनका समाज बहुत सम्मान किया करता था। समस्त तीर्थपुरोहित आपकी बात को गंभीरता के साथ लेकर उसका अनुकरण किया करते थे। कालांतर में बुद्धसेन शुक्ला जी द्वारा संस्था के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया गया। बुद्धसेन शुक्ला जी के पूर्वजों द्वारा ही वृंदावन में प्रथम दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया। स्वयं बुद्धसेन शुक्ला जी भी दुर्गा पूजा के समय अपने हाथों से मां दुर्गा की प्रतिमा बनाकर नौ दिन तक पूर्ण भाव से उनकी विधिवत पूजा किया करते थे। आपकी इस भक्ति से प्रभावित होकर वृंदावन में अन्य स्थानों पर भी दुर्गा पूजा महोत्सव का आयोजन किया जाने लगा।

कालांतर में श्री मान देवी पंडा जी, वासुदेव गौतम जी, नत्थो मोहल्लेदार जी एवं रमेश चंद्र गौतम जी (बीकेडी) जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों ने इस संस्था की बागडोर को संभालने का कार्य किया। श्रीमान रमेश बीकेडी जी, कवि हृदय व्यक्ति थे एवं वृंदावन में स्वांग कला के उस्ताद के रूप में जाने जाते थे। तदोपरान्त महेश चंद्र शर्मा जी संस्था के अध्यक्ष रहे। आपके कार्यकाल में तीर्थपुरोहित समाज में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ एवं संपूर्ण समाज को सूचीबद्ध कर परिचय पत्र जारी करने का कार्य किया गया। आपके बाद श्रीमान नंद कुमार पाठक जी ने संस्था की क्रियाकलापों को आगे बढ़ाते हुए संस्था को नई पहचान दी।

वर्तमान में श्री श्याम सुंदर गौतम जी, संस्था के अध्यक्ष के रूप में अपनी सूझ-बूझ एवं निर्भीक स्वभाव से संस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का कार्य कर रहे हैं। आपके कार्यकाल में समाज के तीर्थ पुरोहितों को पुनः सूचीबद्ध कर डिजिटल परिचय पत्र बनाने का कार्य किया जा रहा है जिससे समाज में बाहरी व्यक्तियों द्वारा हो रहे अतिक्रमण को रोककर समाज शुद्धि का कार्य किया जा सके।

यह संपूर्ण जानकारी हमने अपने बुजुर्गों से प्राप्त की है यदि इसमें कोई त्रुटि हो या कुछ छूट रहा हो तो हम उसके लिए क्षमा प्रार्थी हैं।

श्री बृजवासी पंडा सभा की अध्यक्षों की सूची :-

  • श्रीमान मदन मोहन बांके जी
  • श्रीमान छोटेलाल गौतम जी
  • श्रीमान हर स्वरूप पाठक जी
  • श्रीमान देवी पंडा जी
  • श्रीमान रमेश चंद्र गौतम बीकेडी
  • श्रीमान श्याम सुंदर गौतम जी (वर्तमान)
  • श्रीमान पुरुषोत्तम बाबू चिरघटिया जी
  • श्रीमान श्यामलाल उर्फ सांवरे जी
  • श्रीमान प्रेमलाल गौतम जी
  • श्रीमान वासुदेव गौतम जी
  • श्रीमान महेश चंद्र शर्मा जी
  • श्रीमान रतन लाल जी
  • श्रीमान गजाधर सरदार जी
  • श्रीमान बुद्धसेन शुक्ला जी
  • श्रीमान नत्थो मोहल्लेदार जी
  • श्रीमान नंद कुमार पाठक जी

तीर्थ पुरोहितों का महत्व

तीर्थ पुरोहित अर्थात तीर्थ का पुरोहित तीर्थ अर्थात कोई ऐसा जल स्रोत जो पापों का नाश करने वाला हो शास्त्रों में जिसका उल्लेख हो, जो परम पवित्र पावन हो। और उस जल स्रोत पर तीर्थ यात्रियों की पूजा अर्चना दान पुण्य आदि कर्म वाला एवं उस तीर्थ की संस्कृति एवं महत्व का दर्शन करने वाला व्यक्ति तीर्थ पुरोहित कहलाता है। यह कर्म तीर्थ पुरोहित का धार्मिक अधिकार है जो उसे उसने अपनी प्रखर बुद्धि द्वारा प्राप्त किया है। तीर्थ पुरोहित को पंडा भी कहा जाता है। पंडा शब्द का अर्थ ही अर्थ ही बुद्धि है। अतः तीर्थपुरोहित समाज बुद्धिमान समाजों में सर्वोपरि माना गया है।और इस सम्मान के पीछे तीर्थ पुरोहितों की एक बहुत बड़ी तपस्या है। प्रत्येक तीर्थ का प्रकाश तीर्थ पुरोहित द्वारा ही हुआ है जिस समय इस ब्रज वृंदावन में कोई आधुनिक संसाधन नहीं थे ना यातायात की व्यवस्था थी ना संचार था ना बिजली थी उन विषम परिस्थितियों में इस समाज के लोग दूर दराज के क्षेत्र/देशों में जाकर इस बृज भूमि की महिमा से वहां लोगों को परिचित कराते थे तथा अपने साथ यात्रियों को वृंदावन लाकर ना केवल उनका तीर्थ

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कर्म करते थे वर्णन उनको अपने घर पर ठहरने को स्थान खाने को भोजन एवं तीर्थ दर्शन की व्यवस्था किया करते थे। उसके बदले में यात्री खुशी से जो दान दे जाता था वही उनके जीवन यापन का सहारा होता था। इसी कारण तीर्थ में दान लेना तीर्थ पुरोहित का धार्मिक अधिकार है या कहें ट्रेडिशनल अर्निंग है। यह वह समाज है जिसने अपनी वहियों (विशेष प्रकार की नोट बुकों )में अपनी यजमानों की वंशावली को सुरक्षित रखा है। वंशावली एवं पांडुलिपियों का संरक्षण करने के कारण भी तीर्थ पुरोहितों को पंडा शब्द से पुकारा जाता है। इस समाज ने अपने तीर्थ को अपने हृदय में संजोया है। सदैव उसके उत्थान की सोची हैं। वृंदावन में मां यमुना को तीर्थ पुरोहित अपनी आल्हादिनी देवी और मां मानते हैं इसलिए तीर्थ पुरोहितों को यमुना पुत्र भी कहते हैं। यह समाज के लोग नित्य यमुना जी को लाड़ लड़ाते हैं। यमुना मां की सेवा-पूजा एवं नित्य आरती करते हैं एवं अपने यजमानों और संपूर्ण जगत के कल्याण की कामना करते हैं।

  • 111

    वर्षो की निरंतर सेवा

  • 2000

    से अधिक तीर्थ पुरोहित कार्यरत

  • 500000

    यात्रियों की प्रतिमाह सेवा

  • 30000000

    पीढ़ियों का पोथी संग्रह

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वृंदावन के तीर्थ पुरोहितों की समस्त जानकारी के साथ वृंदावन के पुरातन महत्व का वर्णन करने वाली एक मात्र विषय वस्तु

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